पुरश्चरण क्या है? मंत्र पुरश्चरण की विधि, नियम, जप संख्या और महत्व

पुरश्चरण क्या है?

पुरश्चरण(Purashcharan) क्या होता है, इसे कैसे किया जाता है, इसके कितने अंग हैं, कितने जप करने होते हैं, कौन-से नियमों का पालन करना चाहिए और पुरश्चरण का मंत्र-साधना से क्या संबंध है? भारतीय मंत्र-साधना की परंपरा में पुरश्चरण को एक व्यवस्थित और अनुशासित साधना-पद्धति के रूप में वर्णित किया गया है।
सामान्य रूप से केवल मंत्र की माला करना और किसी मंत्र का पुरश्चरण (Purashcharan) करना एक ही बात नहीं मानी जाती। पुरश्चरण में निश्चित जप-संख्या, संकल्प, आचार-विचार, तथा परंपरा के अनुसार होम, तर्पण, मार्जन और भोजन जैसे अनुष्ठानिक अंग सम्मिलित हो सकते हैं।

हालाँकि अलग-अलग मंत्र, संप्रदाय और ग्रंथों में पुरश्चरण (Purashcharan) की विधि तथा नियमों में भिन्नता मिलती है। इसलिए किसी विशिष्ट मंत्र का पुरश्चरण करते समय उसकी गुरु-परंपरा और संबंधित शास्त्रीय विधि को प्राथमिकता देना चाहिए।

पुरश्चरण क्या है?

‘पुरश्चरण’ संस्कृत का शब्द है। मंत्र-साधना के संदर्भ में इसका अर्थ उस विशेष अनुष्ठान से है जिसके द्वारा किसी मंत्र का निर्धारित संख्या में जप और उससे संबंधित अनुष्ठान किए जाते हैं। तांत्रिक और मंत्रशास्त्रीय परंपराओं में पुरश्चरण का संबंध मंत्र-साधना तथा मंत्र-सिद्धि से जोड़ा गया है।

गौतमीय तन्त्र (अध्याय/पटल ६): में पुरश्चरण को जप आदि पाँच अंगों से संबंधित बताया गया है:

अदृष्टविघ्ननाशाय मन्त्रसिद्ध्यै च यत् कृतम्।
जपादि पञ्चकमेतत् पुरश्चरणमुच्यते॥

अर्थात्: मंत्र-साधना में विघ्नों की निवृत्ति तथा मंत्र-सिद्धि के उद्देश्य से किए जाने वाले जप आदि पाँच अंगों के अनुष्ठान को पुरश्चरण कहा गया है। इसी प्रकार मंत्र-परंपरा के अनेक ग्रंथों में पुरश्चरण को मंत्र-साधना की एक व्यवस्थित प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है।

कुलार्णव तन्त्र (उल्लास १५, श्लोक ८):

विना पुरश्चरणेन मन्त्रो न फलदायकः।
अर्थ: पुरश्चरण किए बिना कोई भी मन्त्र अपना फल देने में समर्थ नहीं होता।

क्या केवल मंत्र-जप करना पुरश्चरण है?

सामान्य मंत्र-जप और पुरश्चरण में अंतर समझना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन श्रद्धा से किसी मंत्र का जप करता है, तो वह मंत्र-जप है। लेकिन जब किसी मंत्र के लिए निश्चित संख्या, संकल्प, नियम और संबंधित अनुष्ठानों के साथ एक निर्धारित साधना की जाती है, तो उसे परंपरा के अनुसार पुरश्चरण कहा जा सकता है। इसलिए पुरश्चरण को केवल माला की संख्या पूरी करने की प्रक्रिया समझना उचित नहीं है।

पुरश्चरण कैसे करते हैं? (विधि और पञ्चाङ्ग)

शारदा तिलक (पटल १६, श्लोक ५४):

जपो होमस्तर्पणं च मार्जनं विप्रभोजनम्।
पञ्चाङ्गमुच्यते भद्रे पुरश्चरणकर्मणि॥

अर्थ: मन्त्र का जप, हवन, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन – पुरश्चरण कर्म में ये पाँच अंग (पञ्चाङ्ग) कहे गए हैं।

पुरश्चरण के पाँच अंग क्या हैं?

परंपरागत रूप से पुरश्चरण के पाँच प्रमुख अंग बताए जाते हैं:

1. जप
2. होम
3. तर्पण
4. मार्जन या अभिषेक
5. ब्राह्मण भोजन

शारदा तिलक में पुरश्चरण के पंचांग का वर्णन इस प्रकार मिलता है:

जपो होमस्तर्पणं च मार्जनं विप्रभोजनम्।
पञ्चाङ्गमुच्यते भद्रे पुरश्चरणकर्मणि॥

अर्थात्: जप, होम, तर्पण, मार्जन और विप्रभोजन को पुरश्चरण के पाँच अंग कहा गया है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सभी मंत्रों और सभी परंपराओं में इन अंगों की विधि बिल्कुल समान नहीं होती। मंत्र, संप्रदाय और गुरु-परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है।

पुरश्चरण के पाँच अंगों का सामान्य क्रम

अंगसामान्य अर्थ
जप –निर्धारित संख्या में मंत्र का उच्चारण
होम –मंत्र के साथ अग्नि में आहुति
तर्पण –मंत्र के साथ जल आदि से तर्पण
मार्जन –मंत्रयुक्त जल से मार्जन/प्रोक्षण
भोजन –परंपरा के अनुसार ब्राह्मण आदि को भोजन

पुरश्चरण में जप की संख्या कैसे निर्धारित होती है?

मंत्र पुरश्चरण की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक जप की निर्धारित संख्या है।

कई मंत्र-शास्त्रीय परंपराओं में मंत्र के अक्षरों की संख्या के आधार पर जप-संख्या निर्धारित करने की पद्धति मिलती है। एक प्रसिद्ध नियम के अनुसार मंत्र के प्रत्येक अक्षर के लिए एक लाख जप का विधान बताया जाता है।

अर्थात्:

मंत्र के अक्षर × 1,00,000 = निर्धारित जप-संख्या

उदाहरण के लिए यदि किसी परंपरा में पाँच अक्षर वाले मंत्र के लिए एक-एक लाख जप का नियम लागू किया जाए, तो कुल संख्या:

5 × 1,00,000 = 5,00,000 जप

होगी।

लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि हर मंत्र के लिए यही गणना अनिवार्य नहीं है। अलग-अलग मंत्रों के लिए अलग पुरश्चरण-विधान उपलब्ध हैं।

पुरश्चरण में दशांश का नियम

पुरश्चरण की एक प्रसिद्ध पद्धति में जप के बाद के अंगों की संख्या क्रमशः दसवें भाग के आधार पर निर्धारित की जाती है।

सामान्य क्रम:

जप → जप का 1/10 होम → होम का 1/10 तर्पण → तर्पण का 1/10 मार्जन → मार्जन का 1/10 भोजन

उदाहरण के लिए यदि कुल जप 5,00,000 हो:

पुरश्चरण का अंगसंख्या
मंत्र-जप5,00,000
होम50,000
तर्पण5,000
मार्जन500
भोजन50

यह गणना उस परंपरा के लिए है जिसमें दशांश-विधान लागू किया जाता है।

इसलिए किसी भी मंत्र के पुरश्चरण में संख्या तय करने से पहले संबंधित मंत्र की शास्त्रीय विधि देखना आवश्यक है।

 

मन्त्र महोदधि (तरंग २२, श्लोक २-३) एवं तन्त्रसार:

लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशेन होमयेत्।
तद्दशांशेन तर्पणं तद्दशांशेन मार्जनम्॥
मार्जनस्य दशांशेन ब्राह्मणान् भोजयेत् सुधीः।

अर्थ: मन्त्र में जितने अक्षर हों, उतने लाख जप करें। कुल जप का दसवाँ हिस्सा (दशांश) हवन करें। हवन का दशांश तर्पण करें, तर्पण का दशांश मार्जन करें और मार्जन के दशांश ब्राह्मणों (या कन्याओं) को भोजन कराएं।

पुरश्चरण में संकल्प का महत्व

पुरश्चरण केवल जप की संख्या तय करने से शुरू नहीं होता। इसमें संकल्प का महत्वपूर्ण स्थान है।

संकल्प का अर्थ है—अपने द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठान, उसके उद्देश्य और निर्धारित साधना का स्पष्ट निश्चय करना।

परंपरागत संकल्प में सामान्यतः निम्न बातें निर्धारित की जा सकती हैं:

  • साधक का नाम
  • गोत्र
  • स्थान
  • तिथि और काल
  • इष्टदेव का स्मरण
  • मंत्र
  • जप की कुल संख्या
  • अनुष्ठान की अवधि
  • सकाम या निष्काम उद्देश्य

संकल्प की वास्तविक भाषा और विधि संबंधित परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

मनुस्मृति (अध्याय २, श्लोक ३):

सङ्कल्पमूलः कामो वै यज्ञाः सङ्कल्पसम्भवाः।

अर्थ: सभी कामनाओं और यज्ञों (अनुष्ठानों) का मूल संकल्प ही है। बिना संकल्प के किसी अनुष्ठान का आरंभ नहीं होता।

 

सामान्यतः पुरश्चरण के आरंभ में, जप प्रारंभ करने से पहले संकल्प लिया जाता है। संकल्प के बाद साधक निर्धारित नियमों के अनुसार अपनी साधना प्रारंभ करता है।

पुरश्चरण कितने दिनों में पूरा होता है?

पुरश्चरण की कोई एक सार्वभौमिक अवधि नहीं है।

यह मुख्य रूप से इन बातों पर निर्भर करता है:

  • मंत्र की निर्धारित जप-संख्या
  • साधक की दैनिक जप क्षमता
  • गुरु या परंपरा द्वारा निर्धारित अवधि
  • प्रतिदिन किए जाने वाले जप की संख्या

उदाहरण:

यदि कुल जप 5,00,000 है और प्रतिदिन 5,000 जप किए जाएँ, तो:

5,00,000 ÷ 5,000 = 100 दिन

अर्थात् 100 दिनों में जप पूरा होगा।

परंपरागत साधना में प्रतिदिन की संख्या को नियमित रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि किसी विशेष परंपरा में प्रतिदिन निश्चित संख्या का संकल्प लिया गया है, तो उसी के अनुसार साधना करनी चाहिए

पुरश्चरण के दौरान कौन-से नियम माने जाते हैं?

पुरश्चरण को सामान्य दैनिक जप की अपेक्षा अधिक अनुशासित साधना माना जाता है। विभिन्न ग्रंथों में साधक के लिए अनेक नियम बताए गए हैं।

शारदा तिलक में ब्रह्मचर्य, हविष्यान्न, भूमि पर शयन और जप में निरंतर अनुराग जैसे नियमों का उल्लेख मिलता है।

कुछ परंपरागत नियम इस प्रकार हैं:

1. ब्रह्मचर्य

पुरश्चरण काल में ब्रह्मचर्य और इंद्रिय-संयम का पालन अनेक परंपराओं में महत्वपूर्ण माना गया है।

शारदा तिलक (पटल १६, श्लोक ५१-५२):

ब्रह्मचर्यं हविष्यं च भूमिशय्या जपे रतिः।
पुरश्चरणकृद्धर्मानेतान्यत्नेन पालयेत्॥

अर्थ: पूर्ण ब्रह्मचर्य, हविष्यान्न (केवल सात्विक भोजन), भूमि पर शयन, और निरंतर जप में अनुराग— पुरश्चरण करने वाले को इन धर्मों का यत्नपूर्वक पालन करना चाहिए।

2. सात्त्विक आहार

साधक को सात्त्विक और सरल भोजन करने की सलाह दी जाती है।

कई परंपराओं में हविष्यान्न का विशेष विधान मिलता है।

3. वाणी पर संयम

अनावश्यक बातचीत, विवाद, निंदा और असत्य भाषण से बचने का निर्देश मिलता है।

4. नियमित जप

प्रतिदिन निर्धारित संख्या में जप करने का प्रयास किया जाता है।

5. शारीरिक और मानसिक शुद्धता

स्नान, स्वच्छ वस्त्र, स्वच्छ साधना-स्थान और मन की एकाग्रता को महत्व दिया जाता है।

6. संयमित जीवनचर्या

नींद, भोजन, मनोरंजन और दैनिक गतिविधियों में संयम रखना साधना के लिए सहायक माना जाता है।

शारदा तिलक (पटल १६, श्लोक ५१-५२):

ब्रह्मचर्यं हविष्यं च भूमिशय्या जपे रतिः।
पुरश्चरणकृद्धर्मानेतान्यत्नेन पालयेत्॥

अर्थ: पूर्ण ब्रह्मचर्य, हविष्यान्न (केवल सात्विक भोजन), भूमि पर शयन, और निरंतर जप में अनुराग – पुरश्चरण करने वाले को इन धर्मों का यत्नपूर्वक पालन करना चाहिए।

मन्त्र महोदधि (तरंग २२, श्लोक ८-९):

ताम्बूलं क्षौरमभ्यङ्गं व्यवायं पलभक्षणम्।
असत्प्रलापं कुटिलं… वर्जयेत्॥

अर्थ: पान चबाना, बाल या दाढ़ी-नाखून काटना (क्षौर कर्म), तेल मालिश, स्त्री-प्रसंग (मैथुन), माँस भक्षण, व्यर्थ वार्तालाप (असत्प्रलाप) और कुटिलता का सर्वथा त्याग करना चाहिए।


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इस लेख को अंत तक पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार। हमने शास्त्रों और गुरु-परंपरा के अनुसार पुरश्चरण की इस जानकारी को यथासंभव प्रामाणिक और सरल रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

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नमः शिवाय